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शनिवार, 18 नवंबर 2017

कोउ नृप होइ

कोउ नृप होइ हमैं का मामू।
रिश्वत से हुईहै सब कामू।।
बसपा देखि सपा का देखो।
बीजेपी को अलग न लेखो।
लंका में सब वावन गज के।
हारि गए हम सबका भज के।।
बन्धुओं कविता की अपनी  सीमाएं हैं अतः गद्य का सहारा भी ले रहा हूँ। बसपा शासन में रिश्वत लेते समय कहा जाता था कि बहन जी को देना है इसलिये रेट कम नहीं होगा। अधिकारी कर्मचारी और बसपाई मौज में थे जनता मायावती को कोसती जाती थी और भृष्ट व्यवस्था में पिसती जाती थी मायावती जी का कोष समृद्ध होता जाता था। सपा का शासन आया तब यह तो कोई नहीं कहता था कि यादव जी को देना है मगर यह जरूर था कि अधिकारी कर्मचारी कहते थे रेट कम नहीं होगा अकेले हम थोड़े ही खाते हैं यह रिश्वत ऊपर तक जाती है अब कितनी ऊपर तक जाती थी पता नहीं किन्तु कार्यकर्ता जरूर चाँदी काटते थे। अब योगी जी का शासन है तो अधिकारी कर्मचारी यह भी नहीं कहता है कि ऊपर तक पहुंचाना है किन्तु बिना रिश्वत लिए सीट पर हिलते भी नहीं और रेट भी हाई फाइ। सीधे व्यंग्य होता है बीजेपी मतलब सबका साथ सबका विकास तो क्या हमारा विकास भी तो जरूरी है। जनता का तो विनाश ही होना है। अधिकारी इतने निरंकुश हो गए हैं कि मेरे अनुभव में आया एक जायज काम के लिये विधायक तक की सिफारिश बेकार गयी। अब किसका आसरा करें यह यक्ष प्रश्न है।

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