ये बुरे दिन हमेशा न रहेंगे। आत्महत्या किसी समस्या का इलाज नहीं है। कर्ज की लत लग जाती है तो ऐसी घटनाएँ बढ़ जाती हैं। सरकार को चाहिए कि किसानों की आय बढ़ाने के उपायों पर काम करे न कि उन्हें कर्ज की सुविधाएं देने पर।
मेरे अन्य ब्लॉग
शनिवार, 25 अप्रैल 2015
शनिवार, 21 मार्च 2015
ऊधौ
ऊधौ मन न भये दस बीस। एक हुतो सो गयो श्याम संग को अवराधे ईश।
मतलब ये कि किसी किसान ने अप्रैल में फसल तैयार होने पर लौटाने का वादा करके उधौ नामक किसी महाजन से कर्ज ले लिया। फसल तैयार हुई और कट गयी। तब उधौ जी अपनी वसूली करने पहुंच गये किसान की चौखट पर। किसान ने उधौ के हाथ पैर जोड़े और कहा उधौ जी इस बार हमारे खेत में फसल बहुत कम हुई। अगर दस बीस मन गल्ला पैदा हुआ होता तो मैं आपका कर्ज चुका देता। केवल एक मन गल्ला पैदा हुआ था सो मैंने आपके मित्र श्याम से भी कुछ कर्ज ले रखा था। वो अभी थोड़ी देर पहले आये थे मैंने उन्हें चुकता कर दिया। आप राधे से प्रार्थना करें की ईश् की कृपा हो तो आपकी कुछ व्यवस्था कर सकूं।
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015
सबक
दस वर्ष तक देश में इटैलियन सरकार रही और इसने कांग्रेस पार्टी के भूसा भर दिया। ठगी और घोटालों के लिए आजादी के बाद के ये 10 साल काले अक्षरों में लिखे जायेंगे। कितना अच्छा होता कि जब अन्ना हजारे जंतर मन्तर पर धरना दे रहे थे तो कांग्रेस को सचेत होकर अपने काम काज में सुधार लाना चाहिए था तथा देश से अपनी करनी के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए थी शायद जनता माफ़ करती और कांग्रेस तीसरी बार सत्ता में होती। किन्तु लेंड़ फूल गया था अजीर्ण की मारी कांग्रेस तुरंत बोली धरना और प्रदर्शन करना या यूं कहें कि हंगामा करना दूसरी बात है तथा चुनाव लड़कर शासन में आना और शासन चलाना दूसरी बात। अगर केजरीवाल सत्ता में आकर दिखाएँ तो समझ में आयेगा। केजरीवाल ने पार्टी बनाई चुनाव लडा और सत्ता भी पाई अरे चुनौती देने वालों अब बैठकर बनाओ बार अउर लगाओ तेल। आज का केजरीवाल विभिन्न दलों की अकर्मण्यता का परिणाम है। जिनमे कांग्रेस के साथ बीजेपी भी शामिल है। जो लोग लोकसभा चुनावों में मोदी की सत्ता नशीनी को अमित शाह के मैनेजमेंट और मोदी के व्यक्तित्व को देख रहे हैं उन्हें अब भी समझ जाना चाहिए कि इस जीत में लोगों की कांग्रेस के प्रति घृणा का भी अहम रोल था। केजरीवाल की जीत सभी दलों के साथ साथ केजरीवाल के लिए भी सबक है जो काम करेगा वह चलेगा। बहुत कठिन है डगर पनघट की।
मंगलवार, 16 दिसंबर 2014
मासूमों की हत्या
आर्मी स्कूल के 132 मासूमों की हत्या की जिम्मेदारी जिस तरह से तहरीके तालिबान ने स्वीकारी है। उससे पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरपन्थ का घिनौना चेहरा उजागर हुआ है। खुदा या अल्लाह के किस स्वरूप के पूजक हैं ये लोग? क्या ये हत्यारे दुनिया में इस्लाम फैलायेंगे? अगर ऐसा तो मुझे अल्लाह के अस्तित्व पर सोंचना पड़ेगा। केवल पेशावर की बात नहीं है? बच्चे चाहे जहाँ के हों चाहे जिसके भी हों ईश्वर का स्वरूप होते हैं? मुझे नहीं लगता कि अल्लाह इस घटना से खुश हुआ होगा। निश्चित रूप से अगर खुदा है और वह न्याय कर्त्ता है तो इस घटना के गुनहगारों को माफ़ नहीं करेगा। ऐसा कोई भी धर्म नहीं कहता है कि बच्चों की हत्या कर किसी तरह का बदला लो। यह बुजदिलों का काम है।