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शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

ऑनलाइन छात्रवृत्ति(Online scholarship) फार्म भरवाने का दोषपूर्ण व जटिल तन्त्र

पिछले 2 वर्षों से उत्तर प्रदेश में छात्रवृत्ति हेतु विद्यार्थियों से ऑनलाइन आवेदन मांगे जा रहे हैं। पहले इन्हें scholarship.up.nic.in पर छात्रों के द्वारा भरा जाता है और फिर विभिन्न डॉक्यूमेंट के साथ इन्हें संस्था में जमा करवाया जाता है। प्राय: 2 कापियों में इस आवेदन की हार्ड कॉपी व डॉक्यूमेंट एक अच्छा खासा पोथन्ना बन जाता है। मेरी समझ में नहीं आता कि ऑनलाइन आवेदन करने के बाद हार्ड कॉपी जमा करवाकर कागज की अनावश्यक बर्बादी व इस कागज को सम्भालने में कर्मचारियों पर बोझ डालने का क्या औचित्य। जब विद्यार्थी एक जानकारी साईट पर डालता है और संस्था उस जानकारी का सत्यापन करती है तो उस पर विश्वास करना चाहिए। झूठी जानकारी देने के लिए संस्था व विद्यार्थी के विरुद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए। एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा। केवल आवेदन ही नहीं भर कर अपलोड करना अपितु पासबुक व काउंसिलिंग लैटर की pdf फाइल बनाकर अपलोड करना भी बवाले जान बिना साइबर कैफे गये कुछ हो नहीं सकता। 50 से 100 रूपये तक वसूल कर लेता है साइबर कैफे। वो तो गनीमत रही बाद में फार्म भरने वाले स्टूडेंट को कुछ सहूलियत हो गयी कि सर्वर पर लोड ज्यादा होने की वजह से पासबुक व कोंसिलिंग लैटर अपलोड करना साईट पर ही बन्दकर दिया गया।


वैसे सरकार को लगा कि विद्यार्थी कैफे संचालकों के माध्यम से ठगे जा सकते हैं तो उसने व्यवस्था कराई कि सहज जन सेवा केन्द्रों से केवल 8 रूपये  में छात्रवृत्ति फार्म भरा जा सकता है। किन्तु मैंने खुद अपने कम्प्यूटर और प्रिंटर का प्रयोग किया तो मुझे लगा कि काम बहुत ज्यादा है और 8 रुपया बहुत कम।


और इस सारी कवायद का फायदा सिर्फ इतना कि सरकार अपना फीडिंग का खर्च बचा पायेगी और फार्म भरने में हुई त्रुटि को विद्यार्थी पर धकेल पाएगी। अरे शाखों पर बैठे हुए उल्लुओं कभी रंगीन चश्मा आँखों से उतार कर ac रूम  से बाहर निकल कर भी कोई योजना बनाते तो तुम्हें पता चलता तुमने अपने सिर से पाव भर बोझ उतारा और विद्यार्थी के कंधे पर सेरों भर धकेल दिया।


होना यह चाहिए या तो मैनुअल फार्म भरवाकर उनकी फीडिंग सरकार कम्प्यूटर पर स्वयं कराए या विद्यार्थी जो फार्म ऑनलाइन करे उसे विद्यालय/ कॉलेज से वेरीफाई करा लिया जाये। हार्ड कॉपी जमा करने का झंझट खत्म। क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में कागज समय और श्रम तीनों बर्बाद हो रहे हैं।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

भ्रष्टाचार खत्म होगा?

पहले पढ़ रहा था समाचार पत्रों में कि जय ललिता की सजा के विरोध में किसी ने आत्म हत्या कर ली या किसी को हर्ट अटैक आ गया तो सोचता था कि भावुकता में कोई कुछ भी कर सकता है क्योकि आत्महत्या और हर्ट अटैक में कोई तर्क काम नहीं करता लेकिन आज पढ़ा कि तमिलनाडू के प्राइवेट स्कूलों ने स्कूल बंद रखे सजा के विरोध में तो आत्मा को बड़ा कष्ट पहुंचा साथ में चिंता भी हुई कि अगर पढ़े लिखे लोग भ्रष्टचारियों का समर्थन करते हुए विधिक संस्थाओं के फैसलों का सम्मान नहीं करेंगे तो क्या कभी इस देश से भ्रष्टाचार खत्म होगा?

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

सफाई

फोटो खिंचवाकर प्रचार पाना किसे अच्छा नहीं लगता झुनिया रोज अपना घर साफ रखती है और अपना दुआरा भी। मगर उसका फोटो कभी नहीं छपा किसी दिन उसकी फोटो छपती अख़बार में तो पूरा देश साफ सुथरा हो जाता उसकी प्रेरणा से। मेरा अनुभव है गाँव गिरवान का गरीब आदमी सबसे ज्यादा सफाई रखता है अपने आस पास। जो जितना बड़ा सफेदपोश वह उतना ही ज्यादा गंदा। सबसे ज्यादा गंदगी फ़ैलाने वाले झाड़ू हाथ में थम लें तो क्या सफाई हो जाएगी?

शनिवार, 21 जून 2014

हिंदी बनाम अंग्रेजी

shiv तिवारी जी मैं बी.ए. तक अंग्रेजी साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ और हिंदी साहित्य का अनौपचारिक अध्येता भी और मैं आज भी अपने को विद्यार्थी ही मानता हूँ मगर एक बात आपको बता दूं अंग्रेजी भाषा में न लिपि और न ही बोल चाल के स्तर पर वैज्ञानिक है। आपको यह पता होना चाहिए अंग्रेजी अपने आप में कोई स्वतंत्र भाषा नही है यह उर्दू की ही तरह लैटिन रोमन फ्रेंच जर्मन चेक आदि भाषाओँ का मिला जुला रूप है। तथा अंग्रेजी का व्याकरण किसी वैज्ञानिक आधार पर नहीं जैसा क़ि संस्कृत के सन्दर्भ में पाणिनि का है। अंग्रेजी भाषा का व्याकरण अंग्रेजी लेखकों राजनीतिज्ञों व विद्वानों के द्वारा लिखे गये व वोले गये वाक्यांशों के पर्यवेक्षण द्वारा रचा व समझा गया है। यहाँ तक कि अंग्रेजी शब्दों की वर्तनी spelling में जो वर्ण लोप हो जाता है उसके मूल में यह वैज्ञानिकता या अविज्ञानिकता का प्रश्न नहीं है अपितु व्यवहारिकता का प्रश्न है। छापेखाने के अविष्कार के साथ शब्दों की स्पेलिंग नहीं बदली किन्तु उच्चारण बदल गया। अस्तु कभी भी अंग्रेजी को वैज्ञानिक भाषा समझने की भूल मत करियेगा। और ऐसा मैं इसलिए नही कह रहा की हिंदी से मुझे प्रेम है और अंग्रेजी से नफरत बल्कि ऐसा इसलिए की यथार्थ यही है।